" अग्ने नय सुपथा राये " ईशावास्योप्िनषद् (18) यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है। इस मंत्र में ऋषि ने बड़े ही प्रतीकात्मक शब्दों में अग्नि से प्रार्थना की है की - हे अग्निदेव! मुझे " राये " अर्थात भौतिक वैभव , ऐश्वर्य-सम्पदा के लिए सुन्दर शुभ पथ से ले चलो। धन जीवन के लिए आवश्यक भी है किन्तु धन सभी बुराइयों का जड़ भी है। धनोपार्जन यदि सच्चाई , ईमानदारी और संतोषवृत्ति के सुमार्ग पर चलकर किया जाये तो मन में शांति का बिरवा फलता है आत्मशक्ति बढ़ती है इसलिए भी यह प्रार्थना सार्थक है की ऋषि ने अग्निदेव से सीधा धन नहीं माँगा , धन तो पुरुषार्थ से ही कमाया जाता है, केवल शुभ मार्ग से भटकने से अपने बचाव के लिए ऋषि ने अग्नि से मार्गदर्शन माँगा है। सुमार्ग पर चलते रहने के लिए सहयोग का वरदान माँगा है।

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Half Day Seminar & Felicitation Program


Half Day Seminar & Felicitation Program on 13th Aug 2015, 03:00 PM at Vrindavan Hall, Civil Line Raipur.